हम और हमारे देश के विर जवान
मैं भी घर से निकला था, वो भी घर से निकला था।
मैं शहर में था, वो जंगल/सरहद में था।
मैं अपने लिए निकला था, वो मेरे लिए निकला था।
हम लौटे अपने -अपने घर,
मेरे कपड़ों पर शहर की धूल थी, उसके बदन में कुछ सुराख़ थे।
मेरे कपड़े मैले थे पर उसके कपड़े लाल थे।
आखिर में -
मुझे महफूज़ रखने के लिए वो आज़ाद हो गया,
मैं उसके फ़र्ज़ के कर्ज को ज़िन्दगी भर ढोने के लिये
मौजूदा ज़िन्दगी में करोड़ों लोगों में शामिल
हो गया।
माफ़ी के काबिल नहीं हम, फिर भी हमें मॉफ करना ऐ दोस्त।
सुकमा शहीदों को विनम्र श्रधांजलि
🙏🇮🇳
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