वो छब्बीस वीर जवान ही थे ,वो रोटी पाने वाले थे
कुछ दिन देश की सेवा कर, वो घर पर आने वाले थे
कुछ की बहनों की शादी थी, कुछ खुद करने वाले थे
कुछ मां से बात किये ही थे, कुछ खा कर करने वाले थे
कुछ की बीवी पेट से थी ,कुछ पापा बनके आये थे
कुछ हुआ धमाका आगे से ,कुछ पीछे से बारूद चला
कुछ हुए शहीद वहीं पर थे ,कुछ आगे होने वाले थे
कुछ की मांए ही रोई थी, कुछ की मांये सदमें में थी
हे दिल्ली वालों रहम करों ,मत वहम करो अब रहम करो
अब दो आदेश जवानों को, चीरो फाडों और खत्म करों
अब दो आदेश जवानों को, धरती में इनको दफन करो
गर न कर पाओ फैसला ,तुम सुनागाछी प्रस्थान करो
या पहन के चूडी तुम नाचो ,और दिल्ली को तुम मुक्त करो.
जय हिन्द जय भारत , जैसा भी मेरे दिल में आया मैने लिख दिया कृप्या स्वीकार करें ओर शेयर जरूर करे
ईशवर सभी जवानों की आत्मा को शन्ति दे.......
आपका अपाना भारतवासी विवेक सुर्यामणी ओझा
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